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हिन्दी दिवस क्‍यों मनाया जाता है? Hindi Diwas 2019

Hindi diwas 2019
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हिन्दी दिवस क्‍यों मनाया जाता है? Hindi Diwas 2019

निज भाषा उन्नतिअहेसबउन्नतिकोमूल इस अवधारणा की सत्यता हमारा राष्ट्र हर वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाकर प्रमाणितकरता है।देश भर में हिन्दी दिवस को वार्षिक समारोह के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में हिन्दी हमारे देश की राष्ट्रीय भाषा है साथ ही विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से भी एक है । 14 सितम्बर 1949 को भारत के संविधान ने गणराज्य की आधिकारिक भाषा के  रूप में हिन्दी को अपनायागया। इसके आलावा हिन्दी दिवस को 26 जनवरी 1950 को देश के संविधान द्वारा आधिकारिक भाषा के रूप उपयोग करने का विचार स्वीकृत किया गया था। उसके बाद से ही देवनागरी लिपि में लिखी गई हिन्दी आधिकारिक भाषा बन गई और हिन्दी दिवस मनाने की परम्परा चल पड़ी ।वास्तव में  हिन्दी भाषा एक समृद्ध भाषा है और राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा के रूप में यह भाषा हमारी अस्मिता और राष्ट्र से जुड़ी हुई है । सम्पर्क भाषा के रुप में इसका प्रयोग भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में होता हे। देश के अधिकांश भागों में इसके प्रचार एवं प्रसार की व्यवस्था है।यह साहित्य के साथ-साथ वाणिज्य ,शिक्षा माध्यम और तकनीकी कार्यों की भाषा के रूप में भी विकसित हो रही है। एक के बाद एक निजी चैनलों ,कार्यक्रमों का आना इस बात का प्रमाण है कि निज भाषा में प्रस्तुत भावों को जनता स्वीकार करने लगी हे।

एक तरफ हिन्दी आगे बढ़ रही है तो दूसरी ओर हिन्दी की कक्षा में पढ़ने वाला छात्र जब अपने शिक्षक से कक्षा में प्रवेश की अनुमति चाहता है तो वह “क्या मैं अन्दर आ सकरा हूँ” कहने के स्थान पर “May I come in”कहता है और एक हिन्दी शिक्षक भी अपनी बातचीत में अधिकांशत अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करने से नहीं झिझकते Iतब इस से अधिक विडम्बनापूर्ण बात और क्या हो सकती है, जो लोग हिन्दी के विकास की बात करते है वह स्वयं भी उसका निरादर करने से बाज नहीं आते।

राष्ट्र भाषा के विरोध में इस समय जो भाषा है वह है अंग्रेज़ी । भारत कई शताब्दियों तक अंग्रेजी शासकों के अधीन रहा । अत: ऐसे वातावरण में साँस लेने के कारण कुछ भारतीय अंग्रेजी भाषा के समर्थक बन गए I वह अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी अंग्रेजी भाषा का पल्ला पकड़े हुए है उनका तर्क है कि भारत से अंग्रेजी को निकाल देने से भारत का अहित होगा , अनेक क्षेत्रों में विशेषकर विज्ञानके क्षेत्र में उसकी प्रगति रुकजाएगी । वास्तव में हमारी यह दलीलें बेतुकी हैं क्योंकि जिन देशों की राष्ट्र भाषा अंग्रेजी नहीं  है  वहाँ भी विज्ञान ने पर्याप्त प्रगति  की है। जापान, रूस , जर्मनी आदि जब बिना अंग्रेजी भाषा के अपने देश की भाषाओँ के माध्यम से विज्ञान के क्षेत्र में इतनी उन्नति कर सकते हैं तो भारत देश हिन्दी माध्यम से क्यों नहीं कर सकता ? हमें यह समझना चाहिए कि अब हम स्वतंत्र हैं हमारे ऊपर अंग्रेजी शासक नहीं हैं लेकिन दुख की बात यह है कि अंग्रेजी शासन के उठ जाने के बाद भी हम मानसिक रूप से उनके गुलाम बने हुए हैं। हम सब यह विश्वास करने में लगे है कि अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के बिना समाज में रहना सम्भव नहीं है । समाज में सम्मान पाने के लिए हमें अंग्रेजी भाषा आनी ही चाहिए । यह मानसिकता सब भारतवासियों की बन गई है जिस के परिणामस्वरूप हिन्दी भाषा का स्थान कहीं पीछे छूटता जारहा है।

अगर हम चाहते है कि हिन्दी भाषा का स्थान भारत में ऊँचा हो या भाषा को लोग गर्व से स्वीकार करें तो हमें भाषा के विषय में अपना दृष्टिकोण सम्मान्यवादी बनाना होगा । विदेशी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करना भी एक गुण है पर अपनी भाषा की अपेक्षाकर के नहीं । महावीर प्रसाद द्विवेदी ( हिन्दीकेमहान साहित्यकार) के शब्दों में “बात यह है कि अपनी भाषा का साहित्य ही जाति और स्वदेश की उन्नति का साधक है ।विदेशी भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लेने और उसमें महत्वपूर्ण ग्रन्थ रचना करने पर भी विशेष सफलता प्राप्त नहीं हो सकती और अपने विशेष देश को विशेष लाभ नहीं पहुँचा सकता । अपनी माँ को निसहाय ,निरुपाय और निर्धन दशा में छोड़कर जो मनुष्य दूसरे की माँ की सेवा शुश्रुषा में रत है उस अधर्म को कृतघ्नता का क्या प्रायश्चित होना चाहिए ,इसका निर्णय़ कोई मनु ,याज्ञवल्कय,ऐर आपस्तक्त ही कर सकता है”।

हिन्दी भाषासभीभारतीय भाषाओं ,प्राचीन संस्कृति औऱ परम्परा को जोड़ने की सबसे बड़ी कड़ी है । वह राष्ट्रीय भावनाओं की एक सुन्दर प्रतीक है ।एक भाषआ के कारण ही भारत का अतीत सुन्दर था । गुप्त जी ने ठीक ही कहा है

सर्वत्रअनुपमएकताका

एकप्रकारप्रभावथा

थीएकभाषा,एकमनथा

एकसबकाभावथा।

अंत में द्विवेदी के शब्दों में कहा जा सकता है …अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है । ज्ञान, विज्ञान धर्म और राजनीति की भाषा सदैव लोकभाषा ही होनी चाहिए । अत एवं अपनी भाषा के साहित्य की सेवा और अभिवृद्धि करना,सभी दृष्टियों से हमारा परम धर्म है ।

इस लिए हम केवल 14 सितम्बर को ही हिन्दी दिवस मनाकर अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकते बल्कि वर्ष के हर दिन भाषा की उन्नति के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।

 

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September 14, 2019

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